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भारत में शिक्षा का अधिकार
परिचय
शिक्षा का अधिकार (आरटीई) भारत में एक मौलिक अधिकार है, जो यह सुनिश्चित करता है कि 6 से 14 वर्ष की आयु के प्रत्येक बच्चे को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार प्राप्त हो। यह अधिकार भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21ए के तहत दर्ज है, जिसे 2002 के 86वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा जोड़ा गया था। बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार (आरटीई) अधिनियम, 2009, इस अधिकार को और मजबूत करता है, जिससे सरकार के लिए सभी बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करना एक कानूनी दायित्व बन जाता है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
भारत में मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा की अवधारणा स्वतंत्रता से पहले के समय से ही चली आ रही है। महात्मा गांधी और गोपाल कृष्ण गोखले जैसे नेताओं ने सभी के लिए शिक्षा के महत्व पर जोर दिया था। स्वतंत्रता के बाद, भारतीय संविधान में शिक्षा को अनुच्छेद 45 के तहत एक नीति निर्देशक सिद्धांत के रूप में शामिल किया गया, जिसका उद्देश्य 14 वर्ष तक के बच्चों को संविधान के अंगीकरण के 10 वर्षों के भीतर मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा प्रदान करना था। हालांकि, 2002 में 86वें संविधान संशोधन के माध्यम से शिक्षा को एक मौलिक अधिकार बनाया गया।
आरटीई अधिनियम, 2009 के प्रमुख प्रावधान
आरटीई अधिनियम, 2009, सभी बच्चों को शिक्षा का अधिकार सुनिश्चित करने के लिए कई महत्वपूर्ण प्रावधान निर्धारित करता है:
- मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा: 6 से 14 वर्ष की आयु के प्रत्येक बच्चे को पड़ोस के स्कूल में मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार है।
- नो डिटेंशन पॉलिसी: अधिनियम ने प्रारंभ में प्राथमिक शिक्षा पूरी होने तक किसी भी कक्षा में बच्चों को रोकने पर प्रतिबंध लगा दिया था। हालांकि, 2019 में इस प्रावधान में संशोधन किया गया ताकि कुछ मामलों में डिटेंशन की अनुमति दी जा सके।
- गुणवत्तापूर्ण शिक्षा: अधिनियम स्कूलों के लिए विशिष्ट मानदंड और मानक निर्धारित करता है, जिसमें छात्र-शिक्षक अनुपात, बुनियादी ढांचा और शिक्षकों की योग्यता शामिल है।
- समावेशी शिक्षा: अधिनियम वंचित समूहों, जिनमें विकलांग बच्चे शामिल हैं, के समावेश पर जोर देता है और उन्हें मुख्यधारा के स्कूलों में शामिल करने का प्रावधान करता है।
- निजी स्कूलों में 25% आरक्षण: अधिनियम के तहत निजी स्कूलों को आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) और वंचित समूहों के बच्चों के लिए 25% सीटें आरक्षित करने की आवश्यकता है, जिसका खर्च सरकार वहन करती है।
कार्यान्वयन में चुनौतियाँ
आरटीई अधिनियम की प्रगतिशील प्रकृति के बावजूद, इसके कार्यान्वयन में कई चुनौतियाँ सामने आई हैं:
- बुनियादी ढांचे की कमी: कई स्कूलों, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में, कक्षाओं, शौचालयों और पीने के पानी की सुविधाओं जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी है।
- शिक्षकों की कमी: प्रशिक्षित शिक्षकों की काफी कमी है, और कई मौजूदा शिक्षक अयोग्य या अत्यधिक कार्यभार से जूझ रहे हैं।
- शिक्षा की गुणवत्ता: शिक्षा तक पहुंच में सुधार हुआ है, लेकिन शिक्षा की गुणवत्ता एक चिंता का विषय बनी हुई है, क्योंकि कई बच्चे बुनियादी साक्षरता और गणित कौशल हासिल नहीं कर पा रहे हैं।
- नामांकन और ड्रॉपआउट दर: अधिनियम के प्रावधानों के बावजूद, नामांकन दर सार्वभौमिक नहीं है, और लड़कियों और वंचित समुदायों के बीच ड्रॉपआउट दर अभी भी अधिक है।
आरटीई अधिनियम का प्रभाव
आरटीई अधिनियम का भारतीय शिक्षा प्रणाली पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा है:
- नामांकन में वृद्धि: अधिनियम के कारण नामांकन दर में काफी वृद्धि हुई है, विशेषकर वंचित समुदायों में।
- बाल श्रम में कमी: शिक्षा को अनिवार्य बनाने से अधिनियम ने बाल श्रम में कमी लाने में योगदान दिया है, क्योंकि अब अधिक बच्चे स्कूल जा रहे हैं।
- वंचित समूहों का सशक्तिकरण: अधिनियम ने वंचित समूहों को शिक्षा तक पहुंच प्रदान करके और सामाजिक गतिशीलता के अवसर प्रदान करके उन्हें सशक्त बनाने में मदद की है।
निष्कर्ष
भारत में शिक्षा का अधिकार सार्वभौमिक शिक्षा और सामाजिक समानता प्राप्त करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। आरटीई अधिनियम के लागू होने के बाद से महत्वपूर्ण प्रगति हुई है, लेकिन यह सुनिश्चित करने के लिए कि प्रत्येक बच्चे को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिले, अभी भी चुनौतियाँ बनी हुई हैं। सरकार, नागरिक समाज और समुदाय के निरंतर प्रयास इन चुनौतियों को दूर करने और आरटीई अधिनियम की पूरी क्षमता को साकार करने के लिए आवश्यक हैं।
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